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Tuesday, May 26, 2015

मैं घुमंतू ..


मैं घुमंतू ..
हर यात्रा अधूरी रह जाती है....
हम कभी पहाड़ों पे चढ़ना भूल जाते हैं
तो कभी रह जाता है सूर्यास्त
कभी किसी शिवाले में बैठ कर भी
ओम का नाद,
कंठ में अवरुद्ध हो जाता है...  
तो कभी
छलांगे मारते दृग को निहारना !
मैंने, एक घुमंतू ने,
हमेशा ये पाया है,
कभी कोई यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती !


मन हमेशा
बल खाती नदी की सिलवटों में पीछे रह जाता है
अप्रैल में देखे नयनाभिराम
फूलों से बौराए सेब के पेड़–बागीचे
मुझे फिर जुलाई में
बुलाते हैं,
सेबों से लदे पेड़ देखने!

अखरोट के गिरे छिलके उठाते
मुझ घुमंतू के हाथ,
उस रोज़ अचानक रुक गए--
जब ठूंठ होते आये पेड़ की ओर देख
एक चरवाहा बोला,
‘बीबी जी ,
कभी इसमें सौ दो सौ अखरोट
एक ही डाल पर लटकते थे
अब सिर्फ़ एखाद दो’
और मेरा मन
उन सैकड़ों अखरोटों के बारे में
सोचने लगता है !

मैं घुमंतू
खूब जानने लगी हूँ
यात्रा में मिले लोग
अगली दफ़ा उसी यात्रा में,
शायद दोबारा नहीं मिलेंगे !
जो मिले हैं, मुझसे जुड़े हैं
वो पूरी यात्रा भर भी
संग नहीं चलेंगे !
जो स्नेह आज है, वो कल नहीं रहेगा
द्वेष का लेकिन पता नहीं ...
शायद वो बढेगा !

मैं घुमंतू,
एक यायावर सी,
समझ गयी हूँ
हर बार, हर यात्रा पर,
ऐसा बहुत कुछ है
जो अविजित बचा रहेगा
और जिसे प्राप्य करने के लिए
सदैव अनगिन आव्हान
हवा में घुले मिलेंगे !
और यही जो अविजित रह गया
जो प्राप्य होकर भी अप्राप्य रहा ,
मुझ घुमंतू को सीखा गया है ,
अनासक्ति
अलगाव
और निर्लिप्तिता के
संविधान !
की,
सब कुछ पीछे छोड़,
नयी यात्राओं पर निकल जाना...

तटस्थता,
घुमंतू होने का पहला नियम है

~ स्वाति-मृगी ~ 


Sunday, October 5, 2014

स्मृतियों के सागर



इन स्मृतियों से
प्यार हुआ जाता है
जीना जिनके बिन हो मुश्किल
उन्ही पे दिल कुर्बान हुआ जाता है!
उन चाहतों में बिंध
सजाई थी एक डोली 
जीवन उसी मिलन पर 
निसार हुआ जाता है!

स्मृतियों के आगोश में
हाँ, तड़पन बहुत है
स्पंदित फिर फिर किन्तु क्यूँ
उनमे ही ह्रदय हुआ जाता है!
वो खुशबु सा समाया रहा
बदन में मेरे
याद करूँ कहीं जो
ये बसंत बौराया जाता है!

स्मृति के सागर
इतने भी बुरे नही होते,
यादों के मंज़र कभी,
धुंधले नही होते!
चाहना न चाहना
कहाँ हाथ में होता है
यही सोच के हर दफा
स्मृतियों से ही प्यार हुआ जाता है!

Friday, March 21, 2014

दिलफरेब सदमा

गुमान था हमें --
सोचते थे ,
इश्क़ नाम का एक दिल रहता है इसमें !!
पिछली पूनो से
इस अमावस तक 
लेकिन , इससे --
सिर्फ ज़हर ही उगला है मैंने !!

हर बार तेरे जुदाई की,
इक और सिलवट संभाली है इसने --
कि ,
इश्क़ के सदमे सहने को दिल
और
जिस्म के सहने को ---
जिस्म ?

उम्र की मार का
हर निशान जवां होता है ,
ये बुझते चरागों के दौर हैं ,
यहाँ हर
सदमा,
बड़ा दिलफरेब होता है !!

~स्वाति-मृगी~
 —

धूप ने ओट से जब कुछ झाँका था ....


शाम ढले फिर छा गये थे बादल 
धूप ने ओट से जब कुछ झाँका था 
मैंने छत पर आकर तब ,
अपने आँसुओं को सूखाया था !

मेरी हँसी से अपनी जेबें भर
उसने इक बाग लगाया था
फूलों में बिंध अपने, तब,
वो मुझसे ही शरमाया था !

ओढ़ कर चादर शरद की
उसने तो अ-लगाव जलाया था ,
मैंने सावन रुतु सा, किन्तु,
जीवन को सजाया था !

शाम ढले फिर छा गये थे बादल
धूप ने ओट से जब कुछ झाँका था
मैंने छत पर आकर तब ,
अपने आंसूओं  को सूखाया था !

~स्वाति-मृगी ~
(९-१० जुलाई २०१३ की मध्य रात्रि )

सिंदूरी सहर

वो सुबह कभी तो आयेगी
मेरे मन के आकाश पर सिंदूरी सहर होगी
हर रंग मुझसे होकर गुजरेगा
हर रंग को भी तो
शायद
मेरी
जरुरत होगी
मुझ तक छूते
कुछ जीवन होंगे या
कुछ रिश्तों के घनेरे जंगल भी होंगे


हर एक उमर झाँकेगी जिसमें से
मेरे बौराये जीवन की
सुनो
सच्ची वो तस्वीर होगी।

~~'रेवा पार से' मेरे कविता संग्रह की एक कविता~~

तनहायी

एक तनहायी शहर की थी,
मेरी,
एक मुझमें भी ,
अक्सर --
जाने क्या कुछ बोला करती थी!

शामो-सहर कमबख्त,
मुझसे,
दोनों मिलकर --
जाने क्या करने को ,
कहा करती थी !

फिर एक रोज,
भीड़ का हिस्सा बन, सोचा,
तन्हायी को आबाद करूँगा,
तनहा लोगों की बातों में आकर
खुद को बहलाऊँगा!

मैंने पाया भीड़ ने, तब
मुझको
सहलाया और दुलराया था
अपने संग पाकर
कुछ जश्न-सा भी मनाया था !


लेकिन तन्हायी का भी
अपना
एक उसूल होता है
भावों संग खेलकर
गूंगा - बहरा हो,
चुप्पा लगा जाता है !

उसूल पसंद तन्हाई ने
आखिर
अपना रंग दिखा दिया,
वो जो शहर था ,मुझमें –
बस गया ...
वो जो मैं था ,
गुम गया !

~स्वाति-मृगी~

९ जुलाई २०१३


(पेंटिंग साभार : बेट्टी पेन्नेल )

Thursday, March 20, 2014

उम्र का अनगढ़ हिस्सा तो नहीं था!

उम्मीद के चश्मे पहन,
किरमिजी धूप के छिलकों में 
परत दर परत
खुलता गया –
बीता, जो,
वो सिर्फ एक साल नहीं था!

उलझी बहसों को
और उलझाता ,
गुज़रा हम पे वो
अमिट सी लिए छाप
अनुभूति का
और एक नया
सिलसिला सिर्फ नहीं था !

बहकाया, तडपाया,
फिर बहकाया --
जिसने !
‘मृगी’ के ह्रदय को
तनहा कर गया ~
फफक कर हँसा और रुला भी गया,
पगला सा कोई ख़्वाब,
और पगला कर गया ,
उम्र का अनगढ़ हिस्सा तो नहीं था!

~स्वाति- मृगी ~
३०/१२/२०१३


(पेंटिंग साभार : क्रिस्सी , यू एस )

फ़ासले

अदावतों से बदनाम रहे 
हल्की सोचों में पले फ़ासले!

चलना था ज़रूरी, आप ही 
निभते रहे फ़ासले दर फ़ासले!

बीहड़ में भी बस जाते हैं 
झुण्डों में सिमटते फ़ासले!

परे धकेल दुनियादारी, जो बोले 
चिलमन हटाओ, थाम लो फ़ासले!

कभी दबे थे रेत में, आज 
नदी के किनारे हुए फ़ासले!

लो गिरा ही दिए तुमने-मैंने 
बुलंद रहते नहीं अक्सर, फ़ासले!

तेरे हुस्न से, न मेरे क़रार से 
मिटेंगे इश्क़ से, ये फ़ासले!

तेरा तुझसे, मेरा मुझसे भले हो,
रूह के रूह से, होते नहीं हैं फ़ासले !

रूह के रूह से, होते नहीं हैं फ़ासले !

~स्वाति-मृगी ~
२०१४ की होली

Monday, October 1, 2012

बदलाव ही नियम है जीने का..

दो रोज़ हुए
शाम ढले,
शायद आखिरी --
काले घन,
चपला संग 
आँख मिचौली खेलते हैं!
आज कचनार के ऊपर
जलधर का जमावड़ा था!
भादों बीत चला,
समीर ने हौले से गाया था--
आश्विन देखते देखते  धूप चढ़ जायेगा...
कार्तिक की गुलाबी सुबहें फिर आयेंगी!
इस वसुंधरा को देखो,
हर ऋतु में सजती  है...
बदलाव ही नियम है जीने का..
खुद सह कर भी सिखाती है!
दो रोज़ हुए
शाम ढले,
शायद आखिरी --
काले घन,
चपला संग 
आँख मिचौली खेलते हैं!

~~स्वाति-मृगी~~

Friday, September 28, 2012

मिटटी का पुतला , मिटटी में मिल गया!


पार्वती-पुत्र 
जब मिटटी से बन कर आया,
माँ की रक्षा हेतु,
पिता से भी युद्ध किया!
सृष्टि के समस्त गुणों से संपन्न
जन-जन के दुखों को दूर किया!
हर घर-घर में,
मिटटी से बन कर था आया,
हम सब के संग संग
सारे सुख दुःख था जिया!
पूड़ी-कचौड़ी, हलवा-खीर,
श्रीखंड-पूरण पोली सब खाया!
बच्चों संग खेला,बड़ों के आँसू पोंछे,
हमारे प्रेम में जो है नहाया!
रहा पूरे दस दिन जैसा हमने रखा..
बदले में साल भर का इन्तेजाम करता गया..
जाते हुए याद दिलाया, है सब कुछ नश्वर, मिट जाना है...
मिटटी का पुतला , मिटटी में मिल गया! 

~~स्वाति-मृगी~~


Thursday, September 27, 2012

दिल चाहता है !!




दिल चाहता है , आज,
तुम्हारे हाथों को थाम
नर्मदा मैय्या की
परिकम्मा कर आऊँ  मैं...

दिल चाहता है आज,
 तुमपे --
अपना सब कुछ लूटा दूँ  मैं!

मैंने,
मेरा मैं तुझे दिया--
ले आज मैंने,
अपना सब कुछ उतार फेंका
और इस रूह का दरवाज़ा खोल
तुझे भीतर भर लिया!

दिल चाहता है,आज--
चन्दन तिलक से सजा कर,
तुझे फिर से
अपना 
खुदा बना लूँ  मैं!




नव्या में प्रकाशित येही कविता :



बीहड़ और प्रेम..



तुम कहते हो की 
मैं तुम्हारे जीवन की 


सबसे अनमोल नेमत हूँ!
और ये भी की
तुम्हारे जीवन में सिवा अँधेरे के
कुछ नहीं है
इसलिए तुम्हें भूल जाऊं--

एक दफ़ा देखो तो
इस चेहरे में तुम्हें 
मोहब्बत की लौ दिखेगी!
ये दीवानगी नहीं 
ये सिर्फ रस्म-ओ-उल्फत की बातें भी नहीं!

बहुत पाकीज़ा चाहतों के सिलसिले
अक्सर 
कहाँ पूरे होते हैं?
सवालों के दायरे में सिमटे तुम...
रूह की क्या कैफियत माँगते हो?

मुझे नहीं मालूम की तुम कैसे दिखते हो
मैंने अब तक तुम्हे छुआ ही कहाँ?
वो श्यामल आँखें 
अब तलक,
नज़रबंद हुई ही कहाँ?

मुझे तो तुम्हारी आवाज़ का उतार चढ़ाव भी नहीं मालूम!
जब तुम मेरा नाम पुकारोगे,
नहीं जानती वो सिहरन कैसी होगी !!

लेकिन बस इतना जानती हूँ
की 
इक रोज़ 
हम दोनों के दरमियां
ख़त्म होंगी ये दूरियां 
जब, 
चाय की प्यालियों में
ढूँढेंगे हम जीवन के कुँहासे को!
जब,
कोयल गायेगी गीत मधुर 
और खेतों में सरसों लहलहाएगी!
तब ,
मैं धानी चुनर ओढ़े,
लाल चूड़ीयाँ पहने,
तुमसे जरुर मिलूँगी!!

क्योंकि,
ज़िन्दगी चाहे 
अँधेरी हो,
भयावह हो,
बीहड़ सी हो.....
प्रेम स्नेह और तपस्या ही 
उसकी असली नेमत है!
और मैं तुम तक
तुम्हारी नेमत जरुर पहुँचाऊँगी


~~स्वाति-मृगी~~

नव्या में २६ ऑगस्ट २०१२ को प्रकाशित : 
http://www.nawya.in/hindi-sahitya/item/%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%B9%E0%A4%A1%E0%A4%BC-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE.html



सेमल के पेड़ पर अटकी रात

कल रात तलक ,
सियाह से आसमान पे
एक नाम लिखा रह  गया था
दिल के आईने में किसी का प्यार,
रुसवाइयों के मंजर दिखा गया था!

लेकिन आज की शब्
बड़ी खुबसूरत है...

तुमने तो ,
सोलह कलाओं से सज्ज चाँद की तरह,
कह दिया--
सब कुछ!!
मूँद कर अपनी पलकों को...
मैं, लेकिन, 
अब क्या कहूँ आगे?
सुनो, 
आज--
ये जो रात है,
ये पिछले आँगन में
सेमल के पेड़ पर अटक गयी है
और
ये मदमस्त 
चाँद है की
 देख रहा है-- 
 टुकुर टुकुर, 
मेरी  ही ओर 

और,
 मैंने, 
आज,
बहुत सालों बाद,
फिर एक बार 
खिड़की के पल्ले,
खोल दिए हैं! 

सुनो, 
आज--
ये जो रात है ना,
सेमल के पेड़ पर अटक गयी है!!

छायाचित्र : गूगल से साभार 
'नव्या' पर मार्च २०१२ में प्रकाशित : 
http://www.nawya.in/hindi-sahitya/item/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%A1%E0%A4%BC-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%85%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4.html