Tuesday, July 26, 2011

खुदा हाफिज़, अब मुझे चलना होगा!



खुदा हाफिज़, अब मुझे चलना होगा!

फिर मिलेंगे, ऐसी कोई
ज़रूरत?
भी नहीं,शायद,चाहत भी नहीं!
नज़र आती मुझे तो!
इसीलिए,
तेरे लिए!
अब मुझे चलना होगा....
तुने मुझे चाहा, मुझे पाया था--
लेकिन आगे क्या होगा, कौन?
कब/कुछ/कभी/सोच पाया था?
शायद तू सच हो और
मैं भी झूठ न होऊं
किसी जनम बैठ कर करेंगे हिसाब--
पर, अब मुझे चलना होगा
कई बार मुड़ कर
रुके थे हम
कई बार रुक कर,
नयी राह साथ मुड़े थे हम...
लेकिन अपनी राहों को अब
अपने-अपने मोड़ देना होगा!
सच मानो ,
इस दफा तो,
मुझे,अब,चलना ही होगा
मैं भीड़ में रहूँ ,या
कहीं अकेले में,
दूर ही से तुझे देख लूँगी--
तू भी मुझे चाहे तो,
हाथ भर दिखा देना!
तो ठीक है,
अब तो मुझे चलना ही होगा
'मोह नहीं बचा मुझे--
कोई लगाव नहीं अब तुझसे--'
कह कर मुझसे दामन छुड़ा लिया
सोच, गर मैंने यह तुझसे कहा होता?
....................................................
क्या तेरे पास इसका जवाब होता?
इसीलिए,
तेरे लिए!
अब मुझे चलना होगा...
अपनी अपनी राहों को अब
अपने-अपने मोड़ देना होगा!

2 comments:

Samit Shrivastava said...

I don not have hindi font or knw how to type, otherwise would like to reflect the feeling and u would also have appreciated,
I really like the thought and feeling attached with that, we often live this situation but seldom able to express that well. really gud , keep it up.

Samit Shrivastava

राजेन्द्र अवस्थी said...

बहुत खूब.....वाह